जब मेहंदी वाले हाथों ने मंगलसूत्र उतारे हैं

जब मेहंदी वाले हाथों ने मंगलसूत्र उतारे हैं

जब मेहंदी वाले हाथों ने मंगलसूत्र उतारे हैंजब मेहंदी वाले हाथों ने मंगलसूत्र उतारे हैं

जब मेहंदी वाले हाथों ने मंगलसूत्र उतारे हैं

दोस्तों  आज मैं आपके सामने  Dr. Hari Om की कविता  जब मेहंदी वाले हाथों ने मंगलसूत्र उतारे हैं  लेकर आया हूं

एक बार जरूर पढ़े  –

मैं केशव का पाथ जन भी गहन मोम  में खोया हूं ,

उन बेटों की याद कहानी लिखते लिखते रोया हूं ,

जिस माथे की कुमकुम बिंदी वापस लौट नहीं पाई

चुटकी झुमके पायल ले गई गई कुर्बानी की अंगडाई

कुछ बहनों की राखी जल गई है बर्फीली घाटी में

वेदी के गठबंधन मिलगए है कारगिल की माटी में

पर्वत पर कितने सिन्दूरी सपने दफ़न हुए होंगे

बिच बसंतो के पदमासी जीवन हवन  हुए होंगे

टूटी चूड़ी धुला महावर रूठा कंगन हाथों का

कोई मौल नहीं दे सकता बासंती  जज्बातों का

जो पहले पहले चुम्बन के बाद्लाम  पर चला गया

नयी दुल्हन की सेज छोड़ कर युद्ध काम पर चला गया

उसको भी मीठी नींदों की करवट याद रही होगी

खुशबू में डूबी यादों की सरवट याद रही होगी

उन आंखो की 2 बूंदों से सातों सागर हारे हैं

जब मेहंदी वाले हाथों ने मंगलसूत्र उतारे हैं

गिल्ली मेहंदी रोई होगी छुपकर घर के कोने में

ताजा काजल छूटा होगा चुपके चुपके रोने में

जब बेटे की अर्थी आई होगी सुने आँगन में

शायद दूध उतर आया हो बूढी माँ के दामन में

कहानिया         चुटकुले

वो विधवा पूरी दुनिया का बोझा सर ले सकती है

जो अपने पत की अर्थी को भी कन्धा दे सकती  है

मैं ऐसी हर देवी के चरणों में सीस झुकाता हूं

इसीलिए मैं कविता को हथियार बनाकर गाता हूं

जिन बेटों ने पर्वत काटे है अपने नाखुनो सें

उनकी कोई मांग नहीं है दिल्ली के कानूनों सें

उनकी गाथा लिखने को अम्बर छोटे पड़ जाते है

उनके लिए हिमालय कन्धा देने को झुक जाता है

सागर की लहरों का गर्जन भी छोटा पड़ जाता है

उन वीरों का दर्शन, और चित्र मंदिर जैसा लगता है

डा० – हरिओम पंवार

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