बादशाह शायरी

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ऐ  हसीनों  तुम्हारे हुस्न का भी जबाब  नहीं,
आहिस्ता आहिस्ता जान लेती हो,
ये गुजारिश  है दिल ए नादान की,
जरा मेहरबानी इनपर भी की जाए ||

 

यूं तो हम बादशाह है,
हमें खौफ खुदा के अलावा किसी का भी नहीं,
पर हुस्न वालो दरख्वास्त है,
नादान के साथ संग दिल्ली ना की जाए ||

 

नजरों की  गुस्ताखी की सजा भला मासूम दिल कयूं झेले,
जिसका गुनाह है सजा भी उसी को मुकरर की जाय ||

बादशाह शायरी

कई चहरे  है इस शहर में ,
जो बहूत हूरों सें भी खुबसूरत है,
ये जरूरी तो नहीं उनका हुस्न,
मुशायरे में सरेआम किया जाए ||

 

समंदर के किनारे पर ना जाने कितनी लहरें टकराकर लौट जाती है,
जरूरी तो नहीं की हर लहर की जुदाई का गम किया जाये ||

 

ये जरूरी तो नहीं की इजहारे इश्क किया ही जाये,
जरूरी तो नहीं की दीदार-ए -हुस्न किया ही जाए ||

बादशाह शायरी

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