मेरा गांव और ये शहर

मेरा गांव और ये शहर

एक गांव और एक शहर के बिच का अंतर आज में आपको इस  शायराना अंदाज में बता रहा  हूं दोस्त अगर आपको  ये पोस्ट पसंद आये तो आप इसे लाइक शेयर और  एक प्यारा सा कमेन्ट जरूर करें  मेरा गांव और ये शहर

कागज़ की कश्ती थी , वो पानी का किनारा था

खेलने की मस्ती थी दिल ये आवारा था ,

आज कहां आ गये हम इस अजनबी शहर में ,

वो कचे घर वाला मेरा गाम कितना प्यारा था ||

—मेहन्दी के हाथ दिखाकर रोई —

बहूत दूर चले आये हैं हम अपने गावं और मकां सें

बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है ए शहर बेह्तर जिन्दगी बनाने में

मेरा गांव और ये शहर  —एक आशिक की कहानी

तेरी बुराइयों को हर अखबार कहता है

और तूं मेरे गाँव को गंवार कहता है

ऐ शहर मुझे तेरी ओकात पता है तूं बची को भी  हुस्न ए बहार कहता है ||

मेरा गांव और ये शहर

मां का दर्द

थक गया है हर शक्श काम करते करते

तूं इसे अमीरी का बाजार कहता  है

गांव चलो वक्त ही वक्त है सबके पास

तेरी सारी फुर्सत तेरा एतवार (सन्डे ) कहता है ||

मेरा गांव और ये शहर

मौन होकर फोन पर रिश्ते निभाए जा रहे हैं

क्यों तूं इस मशीनी दौर को परिवार कहता है

वो मिलने आते थे कलेजा साथ लाते थे

तूं दस्तूर निभाने को रिश्तेदार कहता है ||

बड़े बड़े मसले हल  करती थी पचायते

अंधी भ्रष्ट दलीलों को  दरबार कहता है

अब बचे भी बड़ों का अदब भूल बैठेहै

तूं इस नए दौर को संस्कार कहता है ||

मेरा गांव और ये शहर

मुझे कौन  याद करेगा इस भरी दुनिया में ए ईश्वर

बिना मतलब के तो  लोग तुझे भी याद नहीं करते ||

मेरा गांव और ये शहर का विडियो यहां देखें


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